Wednesday, May 17, 2017

BHADRACHALAM - दक्षिण की अयोध्या




- भद्राचलम का राम मंदिर सूर्यपुत्र

भारत की संस्कृति राममय है। यहां रोम-रोम में राम बसे हैं। भारत में अनेक प्राचीन स्थल हैं जो श्रीराम के जीवन से निकटता से जुड़े हैं। प्रभु राम की जन्मभूमि है अयोध्या तो सरयू का तट केवट की कहानी से जुड़ा है। इसी तरह राम कथा से अभिन्न रूप में जुड़ा है आंध्र प्रदेश के खम्मम जिले में भद्राचलम। इस पुण्य क्षेत्र को "दक्षिण की अयोध्या" माना जाता है और यह अगणित भक्तों का श्रद्धा केन्द्र है। यह वही स्थान है जहां राम ने पर्णकुटी बनाकर वनवास का लंबा समय व्यतीत किया था। भद्राचलम से कुछ ही दूरी पर स्थित पर्णशाला में भगवान अपनी पर्णकुटी बनाकर रहे थे। यहीं कुछ ऐसे शिला खंड हैं जिन पर, यह माना जाता है कि, सीता जी ने वनवास के दौरान वस्त्र सुखाए थे। ऐसा भी जन विश्वास है कि सीता जी का अपहरण यहीं से हुआ था।



भद्राचलम की एक और विशेषता यह है कि यह वनवासी बहुल क्षेत्र है और राम जी वनवासियों के भी उतने ही पूज्य हैं। वनवासी भी परंपरागत रूप से भद्राचलम को अपना आस्था केन्द्र मानते हैं और रामनवमी को भारी संख्या में यहां भगवान राम के सुप्रसिद्ध मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं। वनवासी बहुल क्षेत्र होने के कारण ईसाई मिशनरी यहां मतांतरण षड्यंत्र चलाने की कोशिश में वर्षों से जुटे हैं पर भद्राचलम की महिमा ही ऐसी है कि इनके लाख प्रयासों के बाद भी यहां मतांतरण जोर नहीं पकड़ पाया। स्थानीय वनवासी ईसाई षडंत्रों का प्रखर विरोध भी करते रहे हैं। पांचजन्य के पिछले अंक में इसी मंदिर की अतिथिशाला में ईसाई गतिविधियों की रपट प्रकाशित की गई थी। मिशनरियों का वह प्रयास भी स्थानीय हिन्दुत्वनिष्ठ कार्यकत्र्ताओं ने असफल कर दिया।

इस मंदिर के आविर्भाव की कथा भी वनवासियों से जुड़ी हुई है-कथा ऐसी है कि एक राम भक्त वनवासी महिला पोकला दम्मक्का भद्रिरेड्डीपालेम ग्राम में रहा करती थी। इस वृद्धा ने राम नामक एक लड़के को गोद लेकर उसका पालन पोषण किया। एक दिन राम वन में गया और वापस नहीं लौटा। पुत्र को खोजते-खोजते दम्मक्का जंगल में पहुंच गई और "राम-राम" पुकारते हुए भटकने लगी।

तभी उसे एक गुफा के अंदर से आवाज आई-"मां, मैं यहां हूं"। खोजने पर वहां सीता, राम, लक्ष्मण की प्रतिमाएं मिलीं। उन्हें देखकर दम्मक्का भक्ति भाव से सराबोर हो गई। इतने में उसने अपने पुत्र को भी सामने खड़ा पाया।

बस, भक्त दम्मक्का ने उसी जगह पर देव प्रतिमाओं की स्थापना का संकल्प लिया और बांस की छत बनाकर एक अस्थाई मंदिर बनाया। धीरे-धीरे स्थानीय वनवासी समुदाय भद्रगिरि या भद्राचलम नामक उस पहाड़ी पर श्रीराम जी की पूजा करने लगे। आगे चलकर भगवान ने भद्राचलम को वनवासियों-नगरवासियों के मिलन का हेतु और सेतु बना दिया।

गोलकोंडा (आज का हैदराबाद) का कुतुबशाही नवाब अबुल हसन एक तानाशाह था मगर इसकी ओर से भद्राचलम के तहसीलदार के नाते नियुक्त कंचली गोपन्ना ने कालांतर में उस बांस के मंदिर के स्थान पर भव्य मंदिर बनाकर उस क्षेत्र को धार्मिक जागरण का महत्वपूर्ण केन्द्र बनाने का प्रयास किया। कर वसूली से प्राप्त धन से उसने एक विशाल परकोटे की भीतर भव्य राम मंदिर बनाया, जो आज भी आस्था के अपूर्व केन्द्र के रूप में स्थित है।

गोपन्ना ने भक्ति भाव से सीता जी, श्रीराम जी व लक्ष्मण जी के लिए कटिबंध, कंठमाला (तेलुगू में इसे पच्चला पतकम् कहा जाता है), माला (चिंताकु पतकम्) एवं मुकुट मणि (कलिकि तुराई) भी बनवा कर अर्पित की। उन्होंने राम जी की भक्ति में कई भजन लिखे, इसी कारण लोग उन्हें भक्त रामदास कहने लगे। रामदास विदेशी अक्रमण के खिलाफ देश में भक्ति आंदोलन से जुड़े हुए था। भक्त कबीर रामदास के आध्यात्मिक गुरु थे और उन्होंने रामदास को रामानंदी संप्रदाय की दीक्षा दी थी। रामदास के कीर्तन गांव-गांव, घर-घर में गाए जाते थे और तानाशाही राज के विरोध में खड़े होने की प्रेरणा देते थे। आज भी हरिदास नामक घुमंतु प्रजाति भक्त रामदास के कीर्तन गाते हुए राम भक्ति का प्रचार करती दिखाई देती है। लेकिन रामदास का यह धर्म जागरण कार्य तानाशाह को नहीं भाया और उन्होंने रामदास को गोलकोंडा किले में कैद कर दिया। आज भी हैदराबाद स्थित इस किले में वह काल कोठरी देखने को मिलती है जहां भक्त रामदास को कैदी की तरह रखा गया था।

ऐसा कहा जाता है कि राम व लक्ष्मण नवाब के सामने साधारण वेष में प्रकट हुए थे और रामदास की मुक्ति के बदले उसे सोने की राम मुद्राएं दी थीं। मुद्राएं पाकर नवाब ने रामदास को ससम्मान कैद से मुक्त कर दिया। इतना ही नहीं, इसके बाद प्रति वर्ष रामनवमी के दिन नवाब भी सीता माता व राम जी के विवाहोत्सव (कल्याणम्) के अवसर पर मोती और नये वस्त्र भेंट करने लगा। यह प्रथा पिछले 400 वर्षों से निर्बाध जारी है। आज भी राज्य सरकार की ओर से मुख्यमंत्री मोती भेंट करते हैं। इस तरह यह मंदिर हिन्दू-मुस्लिम सौहार्द का भी प्रतीक है। अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का विरोध करने वाले कट्टरवादी तत्व भद्राचलम के इस सौहार्द से सबक लें, राम जी अवश्य कृपा करेंगे।

1960 के दशक में अंग्रेजी दैनिक इंडियन एक्सप्रेस के सौजन्य से भद्राचलम में श्रीरामदास मंडपम का निर्माण किया गया था। लेकिन आज स्थितियां सेकुलर तत्वों के कारण बिगड़ रही हैं। ईसाई मिशनरियों के निरंतर कुप्रयासों से इस ऐतिहासिक आस्था केन्द्र पर खतरा बढ़ गया है। सजग श्रद्धालुजन और सरकार को मिलकर इन षडंत्रों को नाकाम करना ही होगा।


साभार: पाञ्चजन्य 

Sunday, August 21, 2016

New Roadway Towards Vaishnav Devi To Be Started Soon



परंपरागत रास्ते को 16 किमी तक शेड से ढंका जा चुका है। किनारे पर फेंसिंग भी की गई है, ताकि नीचे कोई गिरे नहीं और कचरा न फैलाए।

कटरा. जम्मू से कटरा का रास्ता पहले दो घंटे का होता था। तीन टनल की बदौलत अब यह बमुश्किल 40 मिनट का रह गया है। अभी लोग कम आ रहे हैं। पर महज डेढ़ महीने बाद नवरात्र शुरू हो जाएंगे। इसलिए वैष्णोदेवी तक जाने वाले नए रास्ते पर काम जोर-शोर से चल रहा है। 7 किमी लंबा ये रास्ता बालिनी ब्रिज से अर्द्धकुंवारी को जोड़ेगा। चेकिंग प्वाइंट और शेड का काम होते ही इसे श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया जाएगा। हालांकि, पालकी और घोड़े वाले इस नए रूट का विरोध कर रहे हैं। कितना छोटा होगा नया रास्ता...

- वैष्णोदेवी श्राइन बोर्ड के सीईओ अजीत कुमार साहू ने बताया कि श्रद्धालुओं में 80% पैदल यात्रा करते हैं। बाकी 6% हेलिकॉप्टर से और 14% घोड़े-पालकी से। नया रास्ता सिर्फ पैदल यात्रियों के लिए होगा। यहां घोड़े-पालकी बैन रहेंगे।

- पुराने रास्ते की तुलना में नया रास्ता सिर्फ 500 मीटर छोटा होगा, लेकिन सुविधाएं कई हैं। रूट इतना चौड़ा होगा कि इमरजेंसी में एम्बुलेंस भी आसानी से आ-जा सके। 
- सबसे खास बात ये होगी कि रूट शुरू होने के बाद यात्री बाणगंगा से अर्द्धकुंवारी और हाथी मत्था की खड़ी और कठिन चढ़ाई से बच जाएंगे। इतना ही नहीं, जमीन पर एंटी स्किड टाइल्स भी लगाई जा रही हैं।

- साथ ही स्लोप स्टैबेलाइजेशन टेक्नोलॉजी का भी इस्तेमाल किया गया है, ताकि चढ़ाई सरल रहे। अगले साल कटरा से भवन तक सामान ले जाने वाला रोप-वे और भवन से भैरवघाटी तक पैसेंजर ले जाने वाला रोपवे भी शुरू हो जाएगा।

- अभी घोड़े से सामान भेजा जाता है। रोपवे बनने के बाद हर घंटे भवन से 800 लोगों को भैरवघाटी पहुंचाया जा सकेगा।

आईआईटी मुंबई ने डिजाइन की आरामदायक पालकी

- आईआईटी मुंबई ने ऐसी पालकी डिजाइन की है, जिसमें बैठने वाले और उसे उठाने वाले को ज्यादा आराम मिले। पालकी वालों के जूते भी नए बने हैं। 
- 33 खतरनाक जगहों पर लैंडस्लाइड ट्रीटमेंट हो रहा। 5 पर हो चुका है, 7 पर अगले फेज में होगा। बाकी बाद में। स्वीडिश कंपनी ये काम कर रही है। 
- मल्टीपर्पज ऑडियो सिस्टम लगाया जा रहा है। आपात स्थिति में लोगों को मैसेज देने के लिए इस्तेमाल होगा। 
- रास्तों को शेड से ढंका जा रहा है। ये इतने मजबूत हैं कि बारिश-धूप के साथ छोटे-मोटे पत्थरों को भी झेल सके। 
- परंपरागत रास्ते को 16 किमी तक शेड से ढंका जा चुका है। किनारे पर फेंसिंग भी की गई है, ताकि कोई गिरे नहीं और कचरा नहीं फैलाए।

नए रास्ते पर घोड़े और पालकी आने की रोक

- मौजूदा रास्ता बाणगंगा से अर्द्धकुंवारी जाता है। वहां से दो रास्त्ते निकलते हैं। पहला हाथी मत्था होते हुए भवन तक जाता है। यहां खड़ी चढ़ाई है। दूसरा हिमकोटि से भवन जाता है।

- नया रास्ता बालिनी ब्रिज से ताराकोट गांव होते हुए अर्द्धकुंवारी पहुंचाएगा। इस रास्ते से हिमकोटि होते हुए भी भवन तक जाया जा सकता है। इसमें घोड़े-पालकी नहीं चलेंगे।

साभार: दैनिक भास्कर


Sunday, July 31, 2016

MANIMAHESH YATRA - मणि महेश यात्रा

वृहत संहिता में तीर्थ का बड़े ही सुंदर शब्‍दों में वर्णन किया गया है। इसके अनुसार, ईश्‍वर वहीं क्रीड़ा करते हैं जहां झीलों की गोद में कमल खिलते हों और सूर्य की किरणें उसके पत्‍तों के बीच से झांकती हो, जहां हंस कमल के फूलों के बीच क्रीड़ा करते हों...जहां प्राकृ‍तिक सौंदर्य की अद्भुत छटा बिखरी पड़ी हो।' हिमालय पर्वत का दृश्‍य इससे भिन्‍न नहीं है। इसलिए इस पर्वत को ईश्‍वर का निवास स्‍थान भी कहा गया है। भगवदगीता में भगवान श्री कृष्‍ण ने कहा है, 'पर्वतों में मैं हिमालय हूं।' यही वजह है कि हिंदू धर्म में हिमालय पर्वत को विशेष स्‍थान प्राप्‍त है। हिंदुओं के पवीत्रतम नदी गंगा का उद्भव भी इसी हिमालय पर्वत से होता है।

मणिमहेश यात्रा


जुलाई-अगस्‍त के दौरान पवित्र मणिमहेश झील हजारों तीर्थयात्रियों से भर जाता है। यहीं पर सात दिनों तक चलने वाले मेला का आयोजन भी किया जाता है। यह मेला जन्‍माष्‍टमी के दिन समाप्‍त होता है। जिस तिथि को यह उत्‍सव समाप्‍त होता है उसी दिन भरमौर के प्रधान पूजारी मणिमहेश डल के लिए यात्रा प्रारंभ करते हैं। यात्रा के दौरान कैलाश चोटि (18,556) झील के निर्मल जल से सराबोर हो जाता है। कैलाश चोटि के ठीक नीचे से मणीमहेश गंगा का उदभव होता है। इस नदी का कुछ अंश झील से होकर एक बहुत ही खूबसूरत झरने के रूप में बाहर निकलती है। पवित्र झील की परिक्रमा (तीन बार) करने से पहले झील में स्‍नान करके संगमरमर से निर्मित भगवान शिव की चौमुख वाले मूर्ति की पूजा अर्चना की जाती है। कैलाश पर्वत की चोटि पर चट्टान के आकार में बने शिवलिंग का इस यात्रा में पूजा की जाती है। अगर मौसम उपयुक्‍त रहता है तो तीर्थयात्री भगवान शिव के इस मूर्ति का दर्शन लाभ लेते हैं।

हमारे जाट देवता संदीप जी मणिमहेश झील के किनारे - साभार चित्र जाट देवता के ब्लॉग से 

स्‍थानीय लोगों के अनुसार कैलाश उनकी अनेक आपदाओं से रक्षा करता है, यही वजह है कि स्‍थानीय लोगों में महान कैलाश के लिए काफी श्रद्धा और विश्‍वास है। यात्रा शुरू होने से पहले गद्दी वाले अपने भेड़ों के साथ पहाड़ों पर चढ़ते हैं और रास्‍ते से अवरोधकों को यात्रियों के लिए हटाते हैं। ताकि यात्रा सुगम और कम कष्‍टप्रद हो। कैलाश चोटि के नीचे एक बहुत बड़ा हिमाच्‍छादित मैदान है जिसको भगवान शिव के क्रीड़ास्‍थल 'शिव का चौगान' के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि यहीं पर भगवान शिव और देवी पार्वती क्रीड़ा करते हैं। वहीं झील के कुछ पहले जल का दो स्रोत है। इसको शिव क्रोत्रि और गौरि कुंड के नाम से जाना जाता है।
चौरसिया मंदिर, भरमौर



साभार : BHARMOUR.IN 

चौरसिया मंदिर का नाम इसके परिसर में स्थित 84 छोटे-छोटे मंदिरों के आधार पर रखा गया है। यह मंदिर भरमौर या ब्रह्मपुरा नामक स्‍थान में स्थित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार 84 योगियों ने ब्रह्मपुरा के राजा साहिल बर्मन के समय में इस जगह भ्रमण करते‍ हुए आए थे। राजा बर्मन के आवभगत से अभिभूत होकर योगियों ने उनको 10 पुत्र रत्‍न प्राप्ति का आशीर्वाद दिया। फलत: राजा बर्मन ने इन 84 योगियों की याद में 84 मंदिरों का निर्माण करा दिया। तभी से इसको चौरसिया मंदिर के नाम से जानते हैं। एक दूसरी धारणा के अनुसार एक बार भगवान शिव 84 योगियों के साथ जब मणिमहेश की यात्रा पर जा रहे थे तो कुछ देर के लिए ब्राह्मणी देवी की वाटिका में रुके। इससे देवी नाराज हो‍ गईं लेकिन भगवान शिव के अनुरोध पर उन्‍होंने योगियों के लिंग रूप में ठहरने की बात मान ली। कहा जाता है इसके बाद यहां पर इन योगियों की याद में चौरसिया मंदिर का निर्माण कराया गया। जबकि एक और मान्‍यता के अनुसार जब 84 योगियों ने देवी के प्रति सम्‍मान प्रकट नहीं किया तो उनको पत्‍थर में तब्‍दील कर दिया गया।

मणिमहेश्‍वर यात्रा मार्ग


मणिमहेश्‍वर 3950 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इसकी चढ़ाई ज्‍यादा कठिन नहीं तो आसान भी नहीं है। इस मंदिर के दर्शन हेतु मई से अक्‍टूबर का महीना सबसे ज्‍यादा उपयुक्‍त है। लेकिन पहाड़ी चढ़ाई होने के कारण एक दिन में 4 से 5 घंटे तक की चढ़ाई ही संभव हो पाती है। मणिमहेश की यात्रा कम से कम सात दिनों की है। मोटे तौर पर मणिमहेश के लिए मार्ग है


- नई दिल्‍ली - धर्मशाला - हर्दसार - दांचो - मणिमहेश झील - दंचो - धर्मशाला - नई दिल्‍ली.

पहला दिन

नई दिल्‍ली पहुंचकर धर्मशाला के लिए प्रस्‍थान।

दूसरा दिन

(धर्मशाला-हर्दसार-दांचो, 2280 मीटर की ऊंचाई पर स्थित) हर्दसार से दांचो जिसकी दूरी 7 कि॰मी॰ है, लेकिन जाने में 3 घंटे लग जाते हैं। रात भर कैंप में गुजारनी होती है।तीसरा दिन

(दांचो - मणीमहेश झील, 3950 मी. की ऊंचाई पर स्थित) दांचो से मणीमहेश तक की चढ़ाई न केवल लंबी है वरन इस यात्रा का सबसे कठिनतम चरण भी है। इस मार्ग पर लगातार चढ़ाई करनी होती है। रात कैंप में बिताना होता है।चौथा दिन

(मणिमहेश झील-दांचो) वापस आने की प्रक्रिया की शुरूआत। इसके तहत पहला दिन दांचो में गुजारना होता है।पांचवां दिन

(दांचो-धर्मशाला)छठा दिन

(धर्मशाला) यहां पहुंचने के उपरांत तीर्थयात्री अगर चाहें तो विभिन्‍न बौद्धमठों को देखने का लुत्‍फ उठा सकते हैं। इसके बाद शाम में पठानकोट पहुंचा जा सकता है। यहां से ट्रेन या सड़क मार्ग से दिल्‍ली के लिए प्रस्‍थान किया जा सकता है।सातवां दिन

(आरक्षित दिन)

चांबा बेस से जाने पर चढ़ाई कुछ आसान हो जाती है। तीर्थयात्री चाहें तो इस मार्ग का भी इस्‍तेमाल कर सकते हैं।

MAA BAGLAMUKHI - माँ बगलामुखी का प्राचीन मंदिर

''ह्मीं बगलामुखी सर्व दुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलम बुद्धिं विनाशय ह्मीं ॐ स्वाहा।''



प्राचीन तंत्र ग्रंथों में दस महाविद्याओं का उल्लेख मिलता है। उनमें से एक है बगलामुखी। माँ भगवती बगलामुखी का महत्व समस्त देवियों में सबसे विशिष्ट है। विश्व में इनके सिर्फ तीन ही महत्वपूर्ण प्राचीन मंदिर हैं, जिन्हें सिद्धपीठ कहा जाता है। उनमें से एक है नलखेड़ा में। तो आइए धर्मयात्रा में इस बार हम अपको ले चलते हैं माँ बगलामुखी के मंदिर।

भारत में माँ बगलामुखी के तीन ही प्रमुख ऐतिहासिक मंदिर माने गए हैं जो क्रमश: दतिया (मध्यप्रदेश), कांगड़ा (हिमाचल) तथा नलखेड़ा जिला शाजापुर (मध्यप्रदेश) में हैं। तीनों का अपना अलग-अलग महत्व है।

मध्यप्रदेश में तीन मुखों वाली त्रिशक्ति माता बगलामुखी का यह मंदिर शाजापुर तहसील नलखेड़ा में लखुंदर नदी के किनारे स्थित है। द्वापर युगीन यह मंदिर अत्यंत चमत्कारिक है। यहाँ देशभर से शैव और शाक्त मार्गी साधु-संत तांत्रिक अनुष्ठान के लिए आते रहते हैं।

इस मंदिर में माता बगलामुखी के अतिरिक्त माता लक्ष्मी, कृष्ण, हनुमान, भैरव तथा सरस्वती भी विराजमान हैं। इस मंदिर की स्थापना महाभारत में विजय पाने के लिए भगवान कृष्ण के निर्देश पर महाराजा युधि‍ष्ठिर ने की थी। मान्यता यह भी है कि यहाँ की बगलामुखी प्रतिमा स्वयंभू है।

यहाँ के पंडितजी कैलाश नारायण शर्मा ने बताया कि यह बहुत ही प्राचीन मंदिर है। यहाँ के पुजारी अपनी दसवीं पीढ़ी से पूजा-पाठ करते आए हैं। 1815 में इस मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया था। इस मंदिर में लोग अपनी मनोकामना पूरी करने या किसी भी क्षेत्र में विजय प्राप्त करने के लिए यज्ञ, हवन या पूजन-पाठ कराते हैं।

यहाँ के अन्य पंडित गोपालजी पंडा, मनोहरलाल पंडा आदि ने बताया कि यह मंदिर श्मशान क्षेत्र में स्थित है। बगलामुखी माता मूलत: तंत्र की देवी हैं, इसलिए यहाँ पर तांत्रिक अनुष्ठानों का महत्व अधिक है। यह मंदिर इसलिए महत्व रखता है, क्योंकि यहाँ की मूर्ति स्वयंभू और जाग्रत है तथा इस मंदिर की स्थापना स्वयं महाराज युधिष्ठिर ने की थी।

इस मंदिर में बिल्वपत्र, चंपा, सफेद आँकड़ा, आँवला, नीम एवं पीपल के वृक्ष एक साथ स्थित हैं। इसके आसपास सुंदर और हरा-भरा बगीचा देखते ही बनता है। नवरात्रि में यहाँ पर भक्तों का हुजूम लगा रहता है। मंदिर श्मशान क्षेत्र में होने के कारण वर्षभर यहाँ पर कम ही लोग आते हैं।

कैसे पहुँचें:-

वायु मार्ग: नलखेड़ा के बगलामुखी मंदिर स्थल के सबसे निकटतम इंदौर का एयरपोर्ट है।

रेल मार्ग: ट्रेन द्वारा इंदौर से 30 किमी पर स्थित देवास या लगभग 60 किमी मक्सी पहुँचकर भी शाजापुर जिले के गाँव नलखेड़ा पहुँच सकते हैं।

सड़क मार्ग: इंदौर से लगभग 165 किमी की दूरी पर स्थित नलखेड़ा पहुँचने के लिए देवास या उज्जैन के रास्ते से जाने के लिए बस और टैक्सी उपलब्ध हैं।

- अनिरुद्ध जोशी 'शतायु' , वेब दुनिया

KHAJJIAR - भारत का मिनी स्विट्रजरलैंड खजियार



हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में स्थित खजियार को भारत का मिनी स्विट्जरलैंड कहा जाता है। खजियार के अलावा, यहां के आस-पास का प्राकृतिक सौंदर्य पर्यटकों को खूब आकर्षित करता है...हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में बेहद खूबसूरत स्थल है खजियार। समुद्र तल से करीब २००० मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह स्थल पश्चिम हिमाचल की धौलाधार पर्वत शृंखला के बीच में बसा है। खजियार का नाम यहां स्थित च्खजी नागज् के मंदिर के कारण पड़ा माना जाता है।


इस स्थल की भौगोलिक संरचना के कारण इसे भारत का मिनी स्विट्जरलैंडज् भी कहा जाता है। यहां एक ही स्थान पर झील, चरागाह और वन इन तीनों पारिस्थितिक तंत्र का होना एक दुर्लभ संयोग की तरह है, जो इसकी सुंदरता में और भी निखार लाता है। खजियार और इसके आस-पास अन्य कई सुंदर जगहें भी हैं, जिन्हें घूमे बगैर आपकी यात्रा अधूरी-सी मानी जाएगी। ...तो आइए चलते हैं इन सभी को बारी-बारी से निहारने।

खजियार झील


यह खजियार का मुख्य आकर्षण है। चारों ओर से घने देवदार के जंगल और हरे मैदान के बीचों-बीच स्थित इस

झील और झील के बीच में स्थित छोटेछोटे भूखंड इसकी खूबसूरती में चार चांद लगाते हैं।

खाजीनाग मंदिर

१२वीं शताब्दी में बना खाजीनाग का मंदिर लोगों की धार्मिक आस्था और श्रृद्धा का प्रतीक है। नाग को समर्पित

इस मंदिर में नाग की मूर्तियों के अलावा, मंडप में पांडवों द्वारा कौरवों पर हुई जीत की छवियों को छत की लकड़ी पर देखा जा सकता है, जो इसकी ऐतिहासिकता को और समृद्ध करती है।

खजियार तक सड़क मार्ग होने के कारण आप किसी भी वाहन द्वारा यहां पहुंच सकते हैं। दिल्ली से खजियार की दूरी लगभग ५६५ किमी. और चंडीगढ़ से २१५ किमी. है। नजदीक का रेलवे स्टेशन पठानकोट (८० किमी.) और नजदीक के हवाई अड्डे पठानकोट (८० किमी.), गग्गल (१८० किमी.) और कांगड़ा हैं।

कब जाएं

अप्रैल से अक्टूबर खजियार घूमने का सही मौसम है। उसके बाद के महीनों में यहां बर्फबारी होने लगती है।